कहानी : साहस की जीत

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-आरती रानी-

अरावली के जंगलों के पास मत्स्य नामक एक राज्य था। वहां के राजा वीरभान अत्यंत साहसी एवं नेक इंसान थे। राजा वीरभान दिन-रात प्रजा की चिंता करते रहते थे। ईश्वर की कृपा ऐसी भी कि राज्य में किसी को कोई अभाव न था परंतु राजा वीरभान कई बार बैठे-बैठे उदास हो जाते थे। दरबारीगण महाराज से उनकी चिंता का कारण पूछते किंतु महाराज किसी को कोई उत्तर नहीं देते थे। दरअसल राजा वीरभान की चिंता का कारण था उनकी लाडली राजकुमारी। राजकुमारी उनकी एकमात्र संतान थी। इसीलिए उसका नाम भी लाड़ली ही रखा गया था। अब वह लाड़ली बड़ी हो गई थी। महाराज उसके विवाह की बात करते तो लाडली भड़क उठती थी। राजकुमारी का कथन था कि उसकी शादी उसी की मर्जी से होगी। महाराज या महारानी ने अगर जबरदस्ती की तो वह अपनी जान दे देगी। राजा वीरभान नगर की प्रजा के राजा थे किंतु वे एक बेटी के पिता भी थे। राजकुमारी के इक्कीसवें जन्मदिन पर महाराज ने फिर उससे विवाह की बात चलाई। राजकुमारी बोली-‘महाराज, मेरे विवाह की ऐसी क्या चिंता है? क्या मैं आप पर बोझ बन गई हूं?’ ‘नहीं बेटी, तुम बोझ नहीं हो। यह तो हमारा धर्म है कि हम समय पर तुम्हारा हाथ किसी योग्य राजकुमार के हाथ में सौंप दें।’

महारानी ने राजकुमारी को प्यार से समझाते हुए कहा था। राजकुमारी बोली-‘मैं अपनी पसंद के व्यक्ति से ही विवाह करना चाहती हूं।’ ‘तुम्हारी पसंद क्या है, हमें भी तो बताओ।’ महाराज ने जिज्ञासावश पूछा तो राजकुमारी ने बताया कि वह सबसे साहसी व्यक्ति से विवाह करना चाहती है। बहुत दिनों बाद महाराज के चेहरे पर मुस्कान और संतोष के भाव दिखाई दिये थे क्योंकि उसकी लाड़ली शादी के लिए तैयार हो चुकी थी। राजा ने मंत्री को बुलाकर सारी बातें सुनाते हुए कहा-‘मंत्री जी, राजकुमारी लाड़ली विवाह के लिए राजी हो गई है। वह चाहती है कि सबसे साहसी युवक से विवाह करे किंतु समझ में नहीं आ रहा है कि हम सबसे साहसी युवक का चयन कैसे करेगें?’ कुछ देर सोचने के बाद मंत्री बोले-‘महाराज, अगले माह राज्य में सालाना तलवारबाजी की प्रतियोगिता हो रही है। उसी समय श्रेष्ठ एवं साहसी युवक का पता चल जाएगा।’ ‘ठीक है मंत्री जी, राज्य में मुनादी करवा दें। जो कोई राजकुमारी से विवाह करना चाहे, वह अपने साहस का प्रदर्शन कर, स्वयं को श्रेष्ठतम सिद्ध करे।’ तलवारबाजी प्रतियोगिता का दिन आ पहुंचा।

मैदान में एक हट्टा-कट्टा नौजवान पहुंचा। उसने वहां जमा भीड़ को ललकारा। भीड़ से एक नौजवान मैदान में आ डटा। तलवारबाजी शुरू हुई। घंटों तक दोनों नौजवान शौर्य का प्रदर्शन करते रहे। अंत में एक नौजवान ने दूसरे नौजवान को गंभीर वार करके वहीं ढेर कर दिया। विजयी नौजवान राजा के मंच की ओर बढ़ा। उसी समय भीड़ के अंदर से एक अन्य युवक ने विजयी नौजवान को ललकारा। मैदान में फिर से तलवारबाजी शुरू हो गयी। पहले से थका नौजवान हार गया। विजेता युवक तलवार हाथ में लेकर भीड़ को ललकार रहा था। युवक की ललकार सुनकर एक घुड़सवार मुसाफिर वहां आ पहुंचा। दोनों में घमासान तलवारबाजी शुरू हो गयी। शाम होने के कारण प्रतियोगिता को वहीं रोक दिया गया। अगले दिन फिर प्रतियोगिता शुरू हुई। दिन भर में कई योद्धा घायल हुए या मारे गए। एक से बढ़कर एक योद्धा अपना पराक्रम दिखा रहे थे। मत्स्यनगरी में कुछ बनजारे भी डेरा डाले हुए थे। बनजारों में एक युवक था जिसका नाम ‘परम’ था। परम ने लोगों से इस रोचक मुकाबले के बारे में सुना था। परम भी प्रतियोगिता में भाग लेने आ पहुंचा। तलवारबाजी की प्रतियोगिता शुरू हो चुकी थी।

एकाएक परम जोर से चिल्लाया-‘महाराज, आप जैसे राजा के राज्य में यह खून की होली क्यों खेली जा रही है?’ प्रतियोगिता में बाधा पड़ते ही महाराज के साथ ही वहां उपस्थित सभी की भौंहें तन गईं। महाराज बोले-‘कौन है यह?’ अब तक परम महाराज के आसन तक आ चुका था। हाथ जोड़कर बोला- ‘क्षमा करें महाराज, मैं आपकी इस अनोखी प्रतियोगिता में बाधा डाल रहा हूं। आप मेरी बातों को सुन लें। इसके बाद जो दंड देना चाहेंगे, मुझे स्वीकार होगा।’ महाराज की आज्ञा पाते ही परम बोला- ‘महाराज, दुनियां में एक से बढ़कर एक योद्धा हैं। एक-एक करके सब आते जाएंगे और मरते या घायल होते जाएंगे। यह अंतहीन सिलसिला कब तक चलता रहेगा? क्या यह आपको शोभा देता है?’ बनजारे की बात सुनकर महाराज स्तबध रह गये। वे कुछ कहते, उससे पहले ही राजकुमारी बोल उठी- ‘महाराज, वही नौजवान सबसे साहसी और वीर है, जो राजा के सामने स्पष्ट बोलने का साहस करे। मैं इसी नौजवान से शादी करूंगी। आप आशीर्वाद दें।’

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