उमा भारती ने दलितों के साथ भोजन का कार्यक्रम छोड़ा

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छतरपुर, 04 मई (वेबवार्ता)। केन्द्रीय मंत्री उमा भारती ने दलितों के साथ भोजन करने का कार्यक्रम यह कहते हुए छोड़ दिया कि वह भगवान राम नहीं हैं, जो लोगों के साथ भोजन करके उन्हें शुद्ध करें। बाद में उमा ने बयान जारी कर खेद जताते हुए दावा किया कि उन्हें नहीं पता था कि उन्हें उनके (दलितों के) साथ भोजन करना है। छतरपुर जिले के दादरी गांव में दो दिन पहले उमा ने कहा कि वह इस प्रकार के समरसता भोज (सामुदायिक भोजन) के कार्यक्रम में भाग नहीं लेती हैं क्योंकि वह स्वयं को भगवान राम नहीं मानती हैं, जो लोगों के साथ भोजन कर उन्हें शुद्ध कर दें। प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा था, ‘‘मैं दलितों के घर में भोजन करने नहीं जाती हूं। लेकिन, मैं इसका समर्थन करती हूं।’’ उन्होंने कहा इसके बजाय मैं दलित समुदाय के लोगों को अपने घर में भोजन कराती हूं। केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘‘जब दलित हमारे घर में आकर रसोई में बैठकर साथ भोजन करेंगे तब हम पवित्र हो पाएंगे। मैं कभी सामाजिक समरसता भोजन में भाग नहीं लेती, क्योंकि मैं खुद को भगवान राम नहीं मानती हूं कि शबरी के घर जाकर भोजन किया तो दलित पवित्र हो जाएंगे। उन्होंने कहा, ‘‘बल्कि मेरा मानना है कि दलित जब मेरे घर में आकर भोजन करेंगे और मैं उन्हें अपने हाथों से खाना परोसूंगी तब मेरा घर पवित्र हो जाएगा। लेकिन, मैं आज आपके साथ बैठकर भोजन नहीं कर पाऊंगी, क्योंकि मैंने भोजन कर लिया है। मैं आप सब से प्यार करती हूं और हमेशा आपके साथ हूं।’’

पिछले कुछ महीनों से, आरएसएस और भाजपा सामाजिक सद्भाव और जातिवाद उन्मूलन का संदेश देने के लिये समरसता भोज (सामुदायिक भोजन) के कार्यकमों को बढ़ावा दे रहे हैं। केंद्रीय मंत्री ने दलितों को दिल्ली अपने घर आने का निमंत्रण देते हुए कहा कि वहां वह उन्हें भोजन कराएंगी। उमा भारती ने कहा कि उनके भतीजे की पत्नी खाना पकाएंगी और वह खुद उन्हें खाना परोसेंगी तब मेरा घर धन्य हो जाएगा, मेरे बर्तन धन्य हो जाएंगे, मेरा पूजाघर धन्य हो जाएगा। दरअसल यहां संत रविदास की प्रतिमा अनावरण कार्यक्रम के बाद सामाजिक समरसता भोज का भी आयोजन किया गया था। इसके बाद, उमा ओर से जारी एक और बयान में कहा गया कि उन्हें उनके सहयोगी हरशु महाराज ने बताया कि कार्यक्रम के बाद समरसता भोज भी है, जिसकी जानकारी उन्हें पहले से नहीं थी। उमा ने कहा कि उन्हें कहीं दूर जाना था इसलिए कार्यक्रम में क्षमा याचना की तथा भोज में भाग नहीं ले पाई। उन्होंने कहा, ‘‘वह जमाना चला गया जब दलितों के घर में बैठकर भोजन करना सामाजिक समरसता का सूत्र था अब तो राजनीति में जो दलितों और पिछड़ों के साथ भेदभाव होता है, उसमें सामाजिक समरसता लानी पड़ेगी। आर्थिक उत्थान, सामाजिक सम्मान तथा शासन एवं प्रशासन में बराबरी की भागीदारी, यही सामाजिक समरसता का मूलमंत्र है।’’ उन्होंने कहा कि मंच के पीछे खड़े पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या आप दलितों के साथ भोजना नहीं करना चाहतीं। इस बात से वह दंग रह गयी कि अब ऐसी बातें भी बनायी जा सकती हैं।

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