तंत्र साधकों के प्रधान देवता कालभैरव

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ब्रह्मा जी के अहंकार को नष्ट करने के उद्देश्य से देवाधिदेव महादेव शिव के तीसरे नेत्र से प्रकट होने वाले काल भैरव सामान्य तौर पर तंत्र और कापालिक साधकों के प्रमुख देवता माने जाते हैं किन्तु भोले शंकर का अंश होने के कारण इन्हें सरल और शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता के रूप में देशभर में पूजा जाता है। इनके महत्व का अंदाजा इस मान्यता से लगाया जा सकता है कि काल भैरव को मत्था टेके बिना भोलेनाथ और मां वैष्णो के दर्शन-पूजन का पूरा फल नहीं मिलता कालभैरव…

शिवपुराण के अनुसार, मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मध्याह्न में भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई। पौराणिक आख्यान है कि सृष्टि के प्रारंभ काल में अनीति और अत्याचार की सीमाएं पार करने वाले अंधकासुर नामक असुर ने एक बार घमंड में चूर होकर भगवान शिव पर आक्रमण कर दिया तब उसके संहार के लिए शिव के तीसरे नेत्र से काल भैरव की उत्पत्ति हुई। एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, शिव के अपमान की प्रतिक्रिया स्वरूप भैरव की उत्पत्ति हुई। बात सृष्टि के प्रारंभ काल की है। एक बार सृष्टिकर्ता ब्रह्म ने भगवान शंकर की वेशभूषा और उनके गणों के भयावह स्वरूप देख कर उनपर कटाक्ष कर दिया। जिस पर भगवान शिव के शरीर से प्रकट हुई विशाल दंडधारी एक प्रचंडकाय काया ब्रह्म के संहार को उद्यत हो उठी। उसके विकराल रूप को देख ब्रह्मा जी भय से चीख पड़े तब स्वयं भगवान शिव ने उस काया को शांत कर ब्रह्माजी को भयमुक्त किया। काल भैरव की उत्पत्ति की तिथि काल-भैरवाष्टमी के नाम से जानी जाती है। काशी के नगरपाल शिव जी ने अपने शरीर से उत्पन्न उसी काया को काल भैरव का नाम दिया।

स्याह काला रंग, स्थूल काया, अंगारकाय त्रिनेत्र, काले वस्त्र, रुद्राक्ष की कण्ठमाला, हाथों में लौह दण्ड और काले कुत्ते की सवारी करने वाले काल भैरव को भगवान शिव ने अपनी पुरी काशी (विश्व की प्राचीनतम नगरी) का नगरपाल नियुक्त किया। भिन्न-भिन्न रूपों में पूजन भय से मुक्ति दिलाने वाले देवता के रूप में काल भैरव की पूजा पूरे देश में होती है और अलग-अलग अंचलों में अलग-अलग नामों से वह जाने-पहचाने जाते हैं। महाराष्ट्र में खण्डोबा उन्हीं का एक रूप है जिनकी पूजा-अर्चना वहां गांव-गांव में की जाती है। दक्षिण भारत में भैरव का नाम शास्ता है। वहां उन्हें भयमोचक उग्र देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है और उनकी अनेक प्रकार की मनौतियां भी स्थान-स्थान पर प्रचलित हैं। रुद्र संहिता के अनुसार भूत, प्रेत, पिशाच, पूतना, कोटरा और रेवती आदि की गणना भगवान शिव के अन्यतम गणों में होती है। इन सब गणों के अधिपति या सेनानायक माने जाते हैं महाभैरव। काल भैरव तंत्र साधकों के प्रधान देवता माने जाते हैं। इनकी पूजा-उपासना में आज भी बलि दी जाती है। जहां कहीं बलिप्रथा समाप्त हो गयी है वहां भी नारियल फोड़ कर इस परंपरा को एक प्रतीक के रूप में संपन्न किया जाता है।

तंत्रशास्त्र में उग्र कापालिक संप्रदाय के देवता के रूप में कालभैरव की आराधना की प्रधानता है। तंत्र साधना का मुख्य लक्ष्य भैरव भाव (भय से मुक्ति का भाव) को अपने भीतर आत्मसात करना होता है। कालांतर में भैरव उपासना की दो शाखाएं- बटुक भैरव तथा काल भैरव के रूप में प्रसिद्ध हुई। जहां बटुक भैरव अपने भक्तों को अभय देने वाले सौम्य स्वरूप में विख्यात हैं वहीं काल भैरव आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंतण्रकरने वाले प्रचंड दंडनायक के रूप में भी प्रसिद्ध हैं। साधना की पौराणिक मान्यता कालिका पुराण में भैरव को नंदी, भृंगी, महाकाल, बेताल की तरह शिवजी का एक गण बताया गया है जिनका वाहन काला श्वान (कुत्ता) है। इसी तरह ब्रह्मवैवर्त पुराण में महाभैरव, संहार भैरव, असितांग भैरव, रुद्र भैरव, काल भैरव, क्रोध भैरव, ताम्रचूड़ भैरव और चंद्रचूड़ भैरव नामक आठ पूज्य भैरवों के पूजन का उल्लेख मिलता है। शिवमहापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का अंशावतार बताया गया है।

भैरव साधना में भी ध्यान की विशिष्ट महत्ता बतायी गयी है। श्री बटुक भैरवजी के ध्यान हेतु इनके सात्विक, राजस और तामस रूपों का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। इनके सात्विक स्वरूप का ध्यान अपमृत्यु का निवारण, आयु-आरोग्य और मोक्षफल की प्राप्ति कराता है जबकि इनके तामस ध्यान का उद्देश्य भूत, ग्रहादि द्वारा शत्रु का शमन करने वाला माना जाता है। शास्त्रकारों की मान्यता है कि सद् गृहस्थ को सदा भैरवजी के सात्विक ध्यान को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। प्रसिद्ध मंदिर भारत में भैरव जी के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं। इनमें काशी का काल भैरव मंदिर सर्वप्रमुख माना जाता है। दूसरा प्रसिद्ध मंदिर नई दिल्ली का पांडवकालीन मंदिर बटुक भैरव मंदिर है। तीसरा ऐतिहासिक मंदिर उज्जैन के काल भैरव का तांत्रिक मंदिर है। इसके अतिरिक्त नैनीताल के समीप घोड़ाखाल का बटुक भैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहां गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है।

इसके अलावा जयगढ़ के प्रसिद्ध किले में काल भैरव का बड़ा प्राचीन मंदिर है जिसमें भूतपूर्व महाराजा जयपुर के ट्रस्ट की ओर से दैनिक पूजा- अर्चना के लिए पारंपरिक पुजारी नियुक्त हैं। उज्जैन के सुप्रसिद्ध काल भैरव मंदिर के बारे में कहा जाता है कि अगर कोई उज्जैन आकर महाकाल के दर्शन करे और काल भैरव न आए तो उसे महाकाल के दर्शन का आधा लाभ ही मिलता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक, यहां के काल भैरव को यह वरदान है कि भगवान शिव की पूजा से पहले उनकी पूजा होगी। काल भैरव के इस मंदिर में मुख्य रूप से मदिरा का प्रसाद चढ़ता है।

इसके अलावा, जब किसी भक्त को मुकदमे में विजय हासिल होती है तो बाबा के दरबार में आकर मावे के लड्डू का प्रसाद चढ़ाते हैं तो वहीं जिन भक्तों की सूनी गोद भर जाती है वो यहां बाबा को बेसन के लड्डू और चूरमे का भोग लगाते हैं। बाबा काल भैरव के इस धाम एक और बड़ी दिलचस्प चीज है जो भक्तों का ध्यान अपनी ओ र खींचती है और वह है मंदिर परिसर में मौजूद दीप स्तंभ। श्रद्धालुओं द्वारा दीप स्तंभ की इन दीपमालिकाओं को प्रज्ज्वलित करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भक्तों द्वारा शीघ्र विवाह के लिए भी यहां दीप स्तंभ का पूजन किया जाता है। जिनकी भी मनोकामना पूरी होती है वे दीप स्तंभ के दीप जरूर रोशन करते हैं।

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